क्योंकि तीन हफ़्ते पहले जब इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किया गया था तब से इस बात की उम्मीद लगाई जा रही थी.
आख़िरकार भगवा चोला पहनने वाले मुख्यमंत्री के लिए शहरों और इलाकों के नाम बदलना प्राथमिकता का विषय है.
उनकी पूरी राजनीति ही प्रतीकवाद और धार्मिक ध्रुवीकरण पर आधारित है.
मुख्यमंत्री बनने से पहले ही योगी आदित्यनाथ ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्र गोरखपुर में कई जगहों के नामों में परिवर्तन किए थे.
11वीं शताब्दी के संत बाबा गोरखनाथ के नाम पर बसे शहर और उनके नाम पर चल रहे मठ का नेतृत्व कर रहे योगी आदित्यनाथ जब यहां के सांसद हुआ करते थे तब उन्होंने गोरखपुर के मियां बाज़ार को माया बाज़ार और हुमायूंपुर को हनुमानपुर बना दिया था.
नाम बदलने के फ़ायदा
ये एक बड़ा सवाल है कि नाम बदलने से इन इलाकों पर क्या असर पड़ा है.
लेकिन इतिहास बताता है कि मध्यकालीन शासकों की धार्मिक असहिष्णुता के लिए उनकी कितनी भी निंदा की जाए लेकिन वे 21वीं शताब्दी के शासकों जितने असहिष्णु नहीं थे.
शोधार्थी कहते हैं प्रयाग और अयोध्या काफ़ी प्राचीन शहर हैं लेकिन किसी भी शासक ने उनका नाम बदलने की कोशिश नहीं की.
सोलहवीं शताब्दी के मुगल बादशाह अकबर ने गंगा किनारे इलाबास (अल्लाह का वास) शहर को बसाया जिसका नाम ब्रिटिश राज के दौरान इलाहाबाद में बदल गया.
लेकिन अकबर ने कभी भी गंगा, यमुना और पौराणिक नदी सरस्वती के संगम किनारे बसे कस्बे प्रयाग का नाम बदलने की कोशिश नहीं की.
इसी तरह अवध के पहले नवाब सादत अली खान ने घाघरा नदी के किनारे 1730 में फ़ैजाबाद शहर को बसाया.
लेकिन कभी भी भगवान राम का जन्म स्थान माने जाने वाले अयोध्या को एक नया नाम नहीं दिया.
ये प्राचीन कस्बा आख़िरकार ब्रिटिश राज में फ़ैज़ाबाद ज़िले का हिस्सा हो गया.ॉ
अयोध्या के लोग भव्य दीपोत्सव के लिए उत्साहित क्यों नहीं हैं?
हत्या का 19 साल पुराना मामला जिससे परेशान हैं योगी
हनुमानगढ़ी का ध्यान रखते थे नवाब
अयोध्या को हिंदू धर्म के तीर्थ स्थान के रूप में ख्याति मिली और इसकी आर्थिक गतिविधियां धार्मिक पर्यटन पर केंद्रित रही.
ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि अयोध्या के सबसे पुराने मंदिर हनुमान गढ़ी के रखरखाव के लिए खर्चा भी नवाब सादत अली ख़ान के ख़ज़ाने से आता था.
यही नहीं, जब सादत अली ख़ान के पोते आसफ़ उद दौला ने 1775 में सिंहासन पर बैठने के बाद अवध की राजधानी को फ़ैज़ाबाद से उठाकर लखनऊ में बना लिया तब भी ये परंपरा जारी रही.
ख़ास बात ये है कि जिस तरह इलाहाबाद का अर्थ ख़ुदा का घर है, उसी तरह फ़ैज़ाबाद का अर्थ 'सभी के कल्याण वाली जगह' है.
इसके विपरीत सीएम योगी ने स्पष्ट रूप से इलाहाबाद और फैजाबाद का नाम बदलते समय किसी की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखा.
कुछ लोगों को ये भी संदेह है कि ये फ़ैसला सिर्फ़ समाज के एक वर्ग की भावनाओं को आहत करने के लिए लिया गया है.
जूलियट के घर गए होते योगी आदित्यनाथ तो.....
फ़ैज़ाबाद बना अयोध्या तो क्या बोले लोग...
'सबका साथ सबका विकास'कैसे?
ये बात सत्तारूढ़ पार्टी की सबका-साथ-सबका-विकास वाले नारे के प्रति समर्पण पर भी सवाल पैदा करती है.
अगर ये मान भी लिया जाए कि इन दोनों के नाम बदलने से इन जगहों को सामाजिक और आर्थिक स्तर पर फायदा पहुंचेगा तो सरकार को आसपास के ज़िलों से ज़मीन लेकर प्रयाग और अयोध्या को नए ज़िले बनाने से किस चीज़ ने रोक दिया.
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